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माफिया का खनन खेल: राजधानी में शहर के बीचोंबीच 80 खदानों में बेहिसाब खुदाई; यहां लिमिट से गहरा खोदा, तालाबों को भी खोद डाला, तार फेंसिंग तक नहीं

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भोपालएक घंटा पहलेलेखक: अजय वर्मा

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फोटो- शान बहादुर। माइनिंग माफिया इतना पावरफुल कि खनिज विभाग इनके इलाके में झांकने तक नहीं जाता।

तस्वीर देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि किस कदर भोपाल जिले की जमीन को अवैध खनन से खोखला किया जा रहा है। जिले में कभी खनिज विभाग ने 192 खदानों में क्रेशर संचालन के लिए अनुमति दी थी, लेकिन बाद में कागजों में इनमें से 112 बंद दी गईं, लेकिन भास्कर टीम ने जब मौके पर जाकर देखा तो 80 खदानें बेरोकटोक चलती मिलीं।

यहां खनन का न तो कोई नियम काम करता है और न ही विभाग। माइनिंग माफिया बेहिसाब खुदाई कर रहा है। वो जमीन को जितना खोद रहा है, उनकी रॉयल्टी भी नहीं दे रहा। ये खदानें नीलबड़, रातीबड़ और कलखेड़ा क्षेत्र की हैं, जो नियम विरुद्ध रिहायशी इलाकों में चल रही हैं। इसकी शिकायत संभागायुक्त कवींद्र कियावत के पास पहुंची थीं।

उन्होंने जांच कराकर कार्रवाई के लिए कहा था, लेकिन माफिया का यहां इतना खौफ है कि खनिज विभाग के किसी अफसर ने अब तक इनकी जांच नहीं की है। बड़ी बात ये है कि इन खदानों में खनन करने वाले लोगों में भाजपा, कांग्रेस, बजरंग दल से जुड़े लोग भी हैं। दो साल पहले तत्कालीन कलेक्टर तरुण पिथोड़े ने ये खदानें बंद करने को कहा था।

विभाग ने क्रेशर के पट्‌टे काटकर दिखावी कार्रवाई भी कर दी थी, लेकिन ये खदानें चुपके से दोबारा शुरू हो गईं। अब हर दिन यहां से सैकड़ों डंपर गिट़्टी निकाली जा रही है, वो बिना रॉयल्टी के। भास्कर ने जब विभाग के अफसरों से बात की तो उन्होंने बताया कि रिकॉर्ड में अभी 129 खदानें चल रही हैं। इनमें से कई के खिलाफ कार्रवाई जारी है।

अनदेखी- 80% खदानों में तार फेंसिंग नहीं, सुरक्षा की दीवार तक नहीं बनाई

  • 80% खदानों में न तार फेंसिंग है, न सुरक्षा दीवार। पिछले साल हुजूर में ऐसी ही एक खदान में दो बच्चों की मौत हो गई थी। जिला खनिज अधिकारी ने खदान का पट़्टा तो निरस्त किया, लेकिन लीज अब तक निरस्त नहीं की।
  • जिला खनिज अधिकारी एचपी सिंह का तर्क है कि खदानों में हुए खनन के लिए सभी खदानों के डिफरेंसियल ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम (डीजीपीएस) सर्वे कराकर जा रहा है। 80 से ज्यादा खदानों में गड़बड़ी मिली है।

नियम हैं- खदानों से 100 मीटर की दूरी तक कोई भी आबादी नहीं होनी चाहिए

  • खदानों की मुख्य खड़क से दूरी होना चाहिए। 100 मीटर में आबादी नहीं होना चाहिए, स्कूल, अस्पताल नहीं होना चाहिए।
  • तालाब से 1 किलोमीटर की दूरी होना चाहिए, भूमि कृषि नहीं होना चाहिए, शमशान घाट और कब्रिस्तान से 500 मीटर की दूरी होना चाहिए।
  • धार्मिक स्थल आसपास नहीं होने चाहिए, जिस गांव के आसपास खदानों का संचालन हो रहा है उनकी ग्राम सभा का प्रस्ताव लिया जाना चाहिए। उसकी एनओसी जरूरी है।

एक ही परिवार के पास दो खदानें, लिमिट से ज्यादा खोदीं

कलखेड़ा की ये खदान आबादी के बीच है। 7 जनवरी 2007 के राजदुलारी पाराशर पत्नी संजय पाराशर को यहां 1.210 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन की अनुमति मिली थी, जो 6 जनवरी 2017 को खत्म हो गई। जितनी खुदाई की अनुमति थी, उससे ज्यादा कर दी गई।

इसी इलाके की एक अन्य खदान संजय के नाम है, जिसकी अनुमति 6 जनवरी 2017 को खत्म हो चुकी है, लेकिन यहां अभी भी खुदाई जारी है। मालीखेड़ी में एक अन्य खदान भी राजदुलारी के नाम पर है और ये जुगाड़ से इसका रिन्यूअल करा लेते हैं।

सीधी बात (एचपी सिंह, जिला खनिज अधिकारी)​​​​​​​जब सिया को आपत्ति नहीं तो हम कौन हैं

  • कलखेड़ा में आबादी के बीच खदानों का संचालन हो रहा क्यों?

खदानें पहले से चल रही हैं। आबादी बाद में आई। इसलिए खनन जारी है।

  • इनकी लीज खत्म हो चुकी थी, फिर आबादी के बीच दोबारा क्यों शुरू की गईं?

हम अनुमति राज्य स्तरीय समाघात निर्धारण प्राधिकरण (सिया) की रिपोर्ट पर देते हैं। जब सिया को आपत्ति नहीं है तो हम कौन होते हैं, रोकने वाले।

  • लिमिट से ज्यादा खुदाई कर दी गई, आपकी टीम देखने भी नहीं गई?

बिना देखे ये नहीं बता सकता कि किसने कितना खनन किया है।

  • कई खदानों में छह मीटर से ज्यादा खुदाई कर दी गई?

खदान संचालकों ने डीजीएमएस की अनुमति ली होगी।

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